+ अज्ञान मिथ्यात्व कुचारित्र के त्याग का उपदेश -
अण्णाणं मिच्छत्तं वज्जह णाणे विसुद्धसम्मत्ते
अह मोहं सारंभं परिहर धम्मे अहिंसाए ॥15॥
अज्ञानं मिथ्यात्वं वर्ज्जय ज्ञाने विशुद्धसम्यक्त्वे ।
अथ मोहं सारम्‍भं परिहर धर्मे अहिंसायाम्‌ ॥१५॥
तज मूढ़ता अज्ञान हे जिय ज्ञान-दर्शन प्राप्त कर ।
मद मोह हिंसा त्याग दे जिय अहिंसा को साधकर ॥१५॥
अन्वयार्थ : [णाणे] सम्यज्ञान, होने पर [अण्णाणं] अज्ञान को और [विसुद्ध सम्मत्ते] विशुद्ध सम्यग्दर्शन होने पर [मिच्छत्तं] मिथ्यात्व को [वज्जहि] छोड़ो [अह] और [अहिंसाए] अहिंसामयी [धम्मे] धर्म होने पर [सारम्भं] आरम्भ सहित [मोहं] मोह को [परिहर] छोडो ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र की प्राप्ति होने पर फिर मिथ्यादर्शन, ज्ञान, चारित्र में मत प्रवर्तो, इसप्रकार उपदेश है ॥१५॥