तस्स य करह पणामं सव्वं पुज्जं च विणय वच्छल्लं
जस्स य दंसण णाणं अत्थि धुवं चेयणाभावो ॥17॥
तस्य च कुरुत प्रणामं सर्वां पूजां च विनयं वात्सल्यम्‌ ।
यस्य च दर्शनं ज्ञानं अस्ति ध्रुवं चेतनाभाव: ॥१७॥
सद्ज्ञानदर्शन चेतनामय भावमय आचार्य को ।
अतिविनय वत्सलभाव से वंदन करो पूजन करो ॥१७॥
अन्वयार्थ : [तस्स] उनको (आचार्य परमेष्ठी को), सब प्रकार (अष्ट द्रव्य )से [पणामं] प्रणाम करो, [सव्वं] सर्व प्रकार से [पुज्जं] पूजा करो, [य] और उनके प्रति [विणय] विनय तथा [वच्छल्लं] वात्सल्य-भाव रखो, [जस्स] जिनके [दंसणणाणं] सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान है तथा [धुवं] निश्चित रूप से [चेयणाभावो] चेतना भाव अर्थात आत्म-स्वरूप की उपलब्धि [अस्थि] विद्यमान है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

दर्शन-ज्ञानमयी चेतना-भाव-सहित जिन-बिंब आचार्य हैं, उनको प्रणामादिक करना । यहाँ परमार्थ प्रधान कहा है, जड़ प्रतिबिंब की गौणता है ॥१७॥