तववयगुणेहिं सुद्धो जाणदि पिच्छेइ सुद्धसम्मत्तं
अरहन्तमुद्द एसा दायारी दिक्खसिक्खा य ॥18॥
तपोव्रतगुणै: शुद्ध: जानाति पश्यति शुद्धसम्यक्त्वम्‌ ।
अर्हन्मुद्रा एषा दात्री दीक्षाशिक्षाणां च ॥१८॥
व्रततप गुणों से शुद्ध सम्यक्भाव से पहिचानते ।
दें दीक्षा शिक्षा यही मुद्रा कही है अरिहंत की ॥१८॥
अन्वयार्थ : जो [तववयगुणेहिं] तप, व्रत और गुणों से [सुद्धो] शुद्ध हैं, [सुद्धसम्मतं] शुद्ध सम्यक्त्व द्वारा [जाणदि] जानते है, [पीच्छेइ] देखते है, [ऐसा] ऐसी [अरहंतमुद्द] अरहन्त मुद्रा (जिनबिम्ब) [दिक्ख] दीक्षा [य] [सिक्खा] शिक्षा [दायारी] देने वाली है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

इसप्रकार जिन-बिंब है वह जिन-मुद्रा ही है, इसप्रकार जिन-बिंब का स्वरूप कहा है ॥१८॥