
जचंदछाबडा :
आचार्य भावपाहुड ग्रन्थ बनाते हैं; वह भावप्रधान पंचपरमेष्ठी हैं, उनको आदिमें नमस्कारयुक्त है, क्योंकि जिनवरेन्द्र तो इसप्रकार हैं-जिन अर्थात् गुणश्रेणी निर्जरायुक्त इसप्रकार के अविरतसम्यग्दृष्टि आदिकों में वर अर्थात् श्रेष्ठ ऐसे गणधरादिकों में इन्द्र तीर्थंकर परमदेव हैं, वह गुणश्रेणीनिर्जरा शुद्धभाव से ही होती है । वे तीर्थंकरभाव के फळ को प्राप्त हुए, घातिकर्म का नाश कर केवलज्ञानको प्राप्त किया, उसीप्रकार सर्व कर्मों का नाश कर, परम शुद्धभाव को प्राप्त कर सिद्ध हुए, आचार्य, उपाध्याय शुद्धभाव के एकदेश को प्राप्त कर पूर्णताको स्वयं साधते हैं तथा अन्य को शुद्धभाव की दीक्षा--शिक्षा देते हैं, इसीप्रकार साधु हैं वे भी शुद्धभाव को स्वयं साधते हैं और शुद्धभाव की ही महिमा से तीनलोक के प्राणियों द्वारा पूजने योग्य वंदने योग्य हैं, इसलिये भावप्राभृतकी आदिमें इनको नमस्कार युक्त है । मस्तक द्वारा नमस्कार करनेमें सब अंग आगये, क्योंकि मस्तक सब अंगोंमें उत्तम है । स्वयं नमस्कार किया तब अपने भावपूर्वक ही हुआ, तब मन--वचन--काय तीनों ही आगये, इसप्रकार जानना चाहिये ॥१॥ |