
जचंदछाबडा :
गुण जो स्वर्ग-मोक्ष का होना और दोष अर्थात् नरकादिक संसार का होना इनका कारण भगवान ने भावों का ही कहा है, क्योंकि कारण कार्य के पहिले होता है । यहाँ मुनि-श्रावक के द्रव्यलिंग के पहिले भावलिंग अर्थात् सम्यग्दर्शनादि निर्मलभाव हो तो सच्चा मुनि-श्रावक होता है, इसलिये भावलिंग ही प्रधान है । प्रधान है वही परमार्थ है, इसलिए द्रव्यलिंग को परमार्थ न जानना, इसप्रकार उपदेश किया है । यहाँ कोई पूछे-भावस्वरूप क्या है ? इसका समाधान-भाव का स्वरूप तो आचार्य आगे कहेंगे तो भी यहाँ भी कुछ कहते हैं-इस लोक में छह द्रव्य हैं, इनमें जीव पुद्गल का वर्तन प्रकट देखने में आता है-जीव चेतनास्वरूप है और पुद्गल स्पर्श, रस, गंध और वर्णस्वरूप जड़ है । इनकी अवस्थासे अवस्थान्तररूप होना ऐसे परिणामको भाव कहते हैं । जीव का स्वभाव-परिणामरूप भाव तो दर्शन--ज्ञान है और पुद्गल कर्म के निमित्त से ज्ञानमें मोह-राग-द्वेष होना विभावभाव है । पुद्गल के स्पर्शसे स्पर्शान्तर, रससे रसांतर इत्यादि गुणों से गुणांतर होना स्वभावभाव है और परमाणुसे स्कंध होना तथा स्कंधसे अन्य स्कंध होना और जीव के भाव के निमित्त से कर्मरूप होना ये विभावभाव हैं । इसप्रकार इनके परस्पर निमित्त-नैमित्तिक भाव होते हैं । पुद्गल तो जड़ है, इसके नैमित्तिकभाव से कुछ सुख--दुःख आदि नहीं है और जीव चेतन है, इसके निमित्त से भाव होते हैं-उनमें सुख-दुःख आदि होते हैं अतः जीव को स्वभावभावरूप रहनेका और नैमित्तिकभावरूप न प्रवर्त्तने का उपदेश है । जीव के पुद्गल कर्म के संयोग से देहादिक द्रव्य का संबंध है,-इसप्रकार द्रव्य की प्रवृत्ति होती है । इसप्रकार द्रव्य-भाव का स्वरूप जानकर स्वभाव में प्रवर्त्ते विभाव में न प्रवर्त्ते उसके परमानन्द सुख होता है; और विभाव राग-द्वेष-मोहरूप प्रवर्त्ते, उसके संसार सम्बन्धी दुःख होता है । द्रव्यरूप पुद्गल का विभाव है, इस सम्बन्धी जीव को दुःख-सुख नहीं होता अतः भावही प्रधान है, ऐसा न हो तो केवली भगवान को भी सांसारिक सुख-दुःख की प्राप्ति हो परन्तु ऐसा नहीं है । इसप्रकार जीव के ज्ञान-दर्शन तो स्वभाव है और राग-द्वेष-मोह ये स्वभाव विभाव हैं और पुद्गल के स्पर्शादिक तथा स्कन्धादिक स्वभाव विभाव हैं । उनमें जीव का हित-अहितभाव प्रधान है, पुद्गल-द्रव्य संबंधी प्रधान नहीं है । बाह्य द्रव्य निमित्तमात्र है, उपादान के बिना निमित्त कुछ करता नहीं है । यह तो सामान्यरूप से स्वभाव का स्वरूप है और इसी का विशेष सम्यग्दर्शन--ज्ञान--चारित्र तो जीव का स्वभाव--भाव है, इसमें सम्यग्दर्शन भाव प्रधान है । इसके बिना सब बाह्यक्रिया मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र हैं ये विभाव हैं और संसार के कारण हैं, इसप्रकार जानना चाहिये ॥२॥ |