
भावविसुद्धिणिमित्तं, बहिरंगस्स कीरए चाओ
बाहिरचाओ विहलो, अब्भंतरगंथजुत्तस्स ॥3॥
भावविशुद्धिनिमित्तं बाह्यग्रंथस्य क्रियते त्यागः ।
बाह्यत्यागः विफलः अभ्यन्तरग्रन्थयुक्तस्य ॥३॥
अर भावशुद्धि के लिए बस परीग्रह का त्याग हो ।
रागादि अन्तर में रहें तो विफल समझो त्याग सब ॥३॥
अन्वयार्थ : [भावविसुद्धिणिमित्तं] भावों की विशुद्धि के लिए [बहिरंगस्स] बाह्य परिग्रह का [कीरए चाओ] त्याग किया जाता है, [अब्भंतरगंथजुत्तस्स] अभ्यन्तर परिग्रह से युक्त के [बाहिरचाओ] बाह्य परिग्रह का त्याग [विहलो] निष्फल है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
अन्तरंग भाव बिना बाह्य त्यागादिक की प्रवृत्ति निष्फळ है, यह प्रसिद्ध है ॥३॥
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