+ इस ही अर्थ को दृढ़ करते हैं -
परिणामम्मि असुद्धे गंथे मुञ्चेइ बाहिरे य जई
बाहिरगंथच्चाओ भावविहूणस्स किं कुणइ ॥5॥
परिणामे अशुद्धे ग्रन्थान् मुञ्चति बाह्यान च यदि ।
बाह्यग्रन्थत्यागः भावविहीनस्य किं करोति ॥५॥
परिणामशुद्धि के बिना यदि परीग्रह सब छोड़ दें ।
तब भी अरे निज आत्महित का लाभ कुछ होगा नहीं ॥५॥
अन्वयार्थ : [जई] यदि [परिणामम्मि] परिणाम [असुद्धे] अशुद्ध होते हुए [बाहिरे] बाह्य [गंथे मुञ्चेइ] परिग्रह [च] आदि को छोड़े तो [बाहिरगंथच्चाओ] बाह्य परिग्रह का त्याग उस [भावविहूणस्स] भावरहित को [किं कुणइ] क्या करे ? अर्थात् कुछ भी लाभ नहीं करता है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

जो बाह्य परिग्रह को छोड़कर मुनि बन जावे और परिणाम परिग्रहरूप अशुद्ध हों, अभ्यन्तर परिग्रह न छोड़े तो बाह्य-त्याग कुछ कल्याणरूप फल नहीं कर सकता । सम्यग्दर्शनादिभाव बिना कर्म-निर्जरारूप कार्य नहीं होता है ॥५॥