+ भाव को परमार्थ जानकर इसी को अंगीकार करो -
जाणहि भावं पढमं किं ते लिंगेण भावरहिएण
पंथिय सिवपुरिपंथं जिणउवइट्ठं पयत्तेण ॥6॥
जानीहि भावं प्रथमं किं ते लिंगेन भावरहितेन ।
पथिक शिवपुरीपंथाः जिनोपदिष्टः प्रयत्नेन ॥६॥
प्रथम जानो भाव को तु भाव बिन द्रवलिंग से ।
तो लाभ कुछ होता नहीं पथ प्राप्त हो पुरुषार्थ से ॥६॥
अन्वयार्थ : [जाणहि भावं पढमं] प्रथम भाव को जान, [किं ते लिंगेण भावरहिएण] भावरहित लिंग से तुझे क्या प्रयोजन है ? [पंथिय सिवपुरिपंथं] शिवपुरी का पंथ [जिणउवइट्ठं पयत्तेण] जिनभगवंतो ने प्रयत्न-साध्य कहा है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

मोक्षमार्ग जिनेश्वरदेव ने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र आत्मभाव-स्वरूप परमार्थ से कहा है, इसलिये इसी को परमार्थ जानकर सर्व उद्यम से अंगीकार करो, केवल द्रव्य-मात्र लिंग से क्या साध्य है ? इसप्रकार उपदेश है ॥६॥