+ अशुभ भावना द्वारा देवों में भी दुःख -
कंदप्पमाइयाओ पंच वि असुहादिभावणाई य
भाऊण दव्वलिंगी पहीणदेवो दिवे जाओ ॥13॥
पंचविध कांदर्पि आदि भावना भा अशुभतम ।
मुनि द्रव्यलिंगीदेव हों किल्विषिक आदिक अशुभतम ॥१३॥
अन्वयार्थ : तू [दव्वलिंगी] द्रव्यलिंगी मुनि होकर [कंदप्पमाइयाओ] कान्दर्पी [पंच वि य] आदि पाँच [असुहादिभावणाई] अशुभ भावना [भाऊण] भाकर [पहीणदेवो] नीच देव होकर [दिवे] स्वर्ग में [जाओ] उत्पन्न हुआ ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

कान्दर्पी, किल्विषिकी, संमोही, दानवी और अभियोगिकी-ये पाँच अशुभ भावना हैं । निर्ग्रंथ मुनि होकर सम्यक्त्व--भावना बिना इन अशुभ भावनाओं को भावे तब किल्विष आदि नीच देव होकर मानसिक दुःख को प्राप्त होता है ॥१३॥