
जचंदछाबडा :
जो मुनि कहलावे और बस्तिका बाँधकर आजीविका करे उसे पार्श्वस्थ वेषधारी कहते हैं । जो कषायी होकर व्रतादिक से भ्रष्ट रहे, संघका अविनय करे, इस प्रकारके वेषधारी को कुशील कहते हैं । जो वैद्यक ज्योतिषविद्या मंत्र की आजीविका करे, राजादिकका सेवक होवे इसप्रकार के वेषधारी को संसक्त कहते हैं । जो जिनसूत्रसे प्रतिकूल, चारित्रसे भ्रष्ट आलसी, इसप्रकार वेषधारी को अवसन्न कहते हैं । गुरुका आश्रय छोड़कर एकाकी स्वच्छन्द प्रवर्ते, जिन आज्ञा का लोप करे, ऐसे वेषधारी को मृगचारी कहते हैं । इनकी भावना भावे वह दुःख ही को प्राप्त होता है ॥१४॥ |