+ समस्त जल पीया फिर भी प्यासा रहा -
तिहुयणसलिलं सयलं पीयं तिण्हाए पी़डिएण तुमे
तो वि ण तण्हाछेओ जाओ चिंतेह भवमहणं ॥23॥
त्रैलोक्य में उपलब्ध जल सब तृषित हो तूने पिया ।
पर प्यास फिर भी ना बुझी अब आत्मचिंतन में लगो ॥२३॥
अन्वयार्थ : हे जीव ! तूने इस लोक में तृष्णा से पीड़ित होकर तीन लोक का समस्त जल पिया, तो भी तृषा का व्युच्छेद न हुआ अर्थात् प्यास न बुझी, इसलिये तू इस संसार का मथन अर्थात् तेरे संसार का नाश हो, इसप्रकार निश्चय रत्नत्रय का चिंन्तन कर ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

संसार में किसी भी तरह तृप्ति नहीं है, जैसे अपने संसार का अभाव हो वैसे चिन्तन करना, अर्थात् निश्चय सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र को धारण करना, सेवना करना, यह उपदेश है ॥२३॥