+ अनेक बार शरीर ग्रहण किया -
गहिउज्झियाइं मुणिवर कलेवराइं तुमे अणेयाइं
ताणं णत्थि पमाणं अणंतभवसायरे धीर ॥24॥
जिस देह में तू रम रहा ऐसी अनन्ती देह तो ।
मूरख अनेकों बार तूने प्राप्त करके छोड़ दीं ॥२४॥
अन्वयार्थ : हे मुनिवर ! हे धीर ! तूने इस अनन्त भवसागर में कलेवर अर्थात् शरीर अनेक ग्रहण किये और छोड़े, उनका परिमाण नहीं है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

हे मुनिप्रधान ! तू इस शरीरसे कुछ स्नेह करना चाहता है तो इस संसार में इतने शरीर छोड़े और ग्रहण किये कि उनका कुछ परिमाण भी नहीं किया जा सकता है ।