
जचंदछाबडा :
मधुपिंगल नाम के मुनि की कथा पुराण में है उसका संक्षेप ऐसे है -- इस भरतक्षेत्र के सुरम्यदेश में पोदनापुर का राजा तृणपिंगल का पुत्र मधुपिंगल था । वह चारणयुगल नगर के राजा सुयोधन की पुत्री सुलसा के स्वयंवर में आया था । वही साकेतापुरी का राजा सगर आया था । सगर के मंत्री ने मधुपिंगल को कपट से नया सामुद्रिक शास्त्र बनाकर दोषी बताया कि इसके नेत्र पिंगल हैं (माँजरा है) जो कन्या इसको वरे सो मरण को प्राप्त हो । तब कन्या ने सगर के गले में वरमाला पहिना दी । मधुपिंगल का वरण नहीं किया, तब मधुपिंगल ने विरक्त होकर दीक्षा ले ली । फिर कारण पाकर सगर के मंत्री के कपट को जानकर क्रोध से निदान किया कि मेरे तप का फल यह हो -- अगले जन्म में सगर के कुल को निर्मूल करूँ, उसके पीछे मधुपिंगल मरकर महाकालासुर नाम का असुर देव हुआ, तब सगर को मंत्री सहित मारने का उपाय सोचना लगा । इसको क्षीरकदम्ब ब्राह्मण का पुत्र पापी पर्वत मिला, तब उसको पशुओं की हिंसारूप यज्ञ का सहायक बन ऐसा कहा । सगर राजा को यज्ञ का उपदेश करके यज्ञ कराया, तेरे यज्ञ का मैं सहायक बनूंगा । तब पर्वत ने सगर से यज्ञ कराया / पशु होमे । उस पाप से सगर सातवें नरक गया और कालासुर सहायक बना सो यज्ञ करनेवालों को स्वर्ग जाते दिखाये । ऐसे मधुपिंगल नामक मुनि ने निदान से महाकालासुर बनकर महापाप कमाया, इसलिये आचार्य कहते हैं कि मुनि बन जाने पर भी भाव बिगड़ जावे तो सिद्धि को नहीं पाता है । इसकी कथा पुराणों से विस्तारसे जानो । |