
जचंदछाबडा :
वशिष्ठ मुनि की कथा ऐसे है -- गंगा और गंधवती दोनों नदियों का जहाँ संगम हुआ है वहाँ जठरकौशिक नाम की तापसी की पल्ली थी । वहाँ एक वशिष्ठ नाम का तपस्वी पंचाग्नि से तप करता था । वहाँ गुणभद्र वीरभद्र नाम के दो चारणमुनि आये । उस वशिष्ठ तपस्वी को कहा -- जो तू अज्ञान-तप करता है इसमें जीवों की हिंसा होती है, तब तपस्वी ने प्रत्यक्ष हिंसा देख और विरक्त होकर जैन-दीक्षा ले ली, मासोपवास सहित आतापन-योग स्थापित किया, उस तप के माहात्म्य से सात व्यन्तर देवों ने आकर कहा, हमको आज्ञा दो सो ही करें, तब वशिष्ठ ने कहा, अभी तो मेरे कुछ प्रयोजन नहीं है, जन्मांतर में तुम्हें याद करूँगा । फिर वशिष्ठ ने मथुरापुरी में आकर मासोपवास सहित आतापन योग स्थापित किया । उसको मथुरापुरी के राजा उग्रसेन ने देखकर भक्तिवश यह विचार किया कि मैं इनको पारणा कराऊँगा । नगर में घोषणा करा दी कि इन मुनि को और कोई आहार न दे । पीछे पारणा के दिन नगर में आये, वहाँ अग्नि का उपद्रव देख अंतराय जानकर वापिस जले गये । फिर मासोपवास किया, फिर पारणा के दिन नगर में आये तब हाथी का क्षोभ देख अंतराय जानकर वापिस चले गये । फिर मासोपवास किया, पीछे पारणा के दिन फिर नगर में आये । तब राजा जरासिंघ का पुत्र आया, उसके निमित्त से राजा का चित्त व्यग्र था इसलिये मुनि को पड़गाहा नहीं, तब अंतराय मान वापिस वन में जाते हुए लोगों को वचन सुने -- राजा मुनि को आहार दे नहीं और अन्य देनेवालों को मना कर दिया; ऐसे लोगों के वचन सुन राजा पर क्रोध कर निदान किया कि -- इस राजा का पुत्र होकर राजा का निग्रह कर मैं राज करूँ, इस तप का मेरे यह फल हो, इसप्रकार निदान से मरा । राजा उग्रसेन की रानी पद्मावती के गर्भ में आया, मास पूरे होने पर जन्म लिया तब इस को क्रूर-दृष्टि देखकर काँसी के संदूक में रक्खा और वृतान्त के लेख सहित यमुना नदी में बहा दिया । कौशाम्बी में मंदोदरी नाम की कलाली ने उसको लेकर पुत्रबुद्धि से पालन किया, कंस नाम रखा । जब वह बड़ा हुआ तो बालकों के साथ खेलते समय सबको दुःख देने लगा, तब मंदोदरी ने उलाहनों के दुःख से इसको निकाल दिया । फिर यह कंस शौर्यपुर गया वहाँ वसुदेव राजा के पयादा (सेवक) बनकर रहा । पीछे जरासिंध प्रतिनारायण का पत्र आया कि जो पोदनपुर के राजा सिंहरथ को बाँध लावे उसको आधे राज्य-सहित पुत्री विवाहित कर दूँ । तब वसुदेव वहाँ कंस सहित जाकर युद्ध करके उस सिंहरथ को बाँध लाया, जरासिंध को सौंप दिया । फिर जरासिंध ने जीवंयशा पुत्री सहित आधा राज्य दिया, तब वसुदेव ने कहा -- सिंहरथ को कस बांधकर लाया है, इसको दो । फिर जरासिंध ने इसका कुल जानने के लिये मंदोदरी को बुलाकर कुल का निश्चय करके इस को जीवंयशा पुत्री ब्याह दी; तब कंस ने मथुरा का राज लेकर पिता उग्रसेन राजा को और पद्मावती माता को बंदीखाने में डाल दिया, पीछे कृष्ण नारायण से मृत्यु को प्राप्त हुआ । इसकी कथा विस्तारपूर्वक उत्तरपुराणादि से जानिये । इसप्रकार वशिष्ठ मुनि ने निदान से सिद्धि को नहीं पाई, इसलिये भावलिंग ही से सिद्धि है ॥४६॥ |