+ परीषह जय की प्रेरणा -
जह पत्थरो ण भिज्जइ परिट्ठिओ दीहकालमुदएण
तह साहू वि म भिज्जइ उवसग्गपरीसहेहिंतो ॥95॥
यथा प्रस्तरः न भिद्यते परिस्थितिः दीर्घकालमुदकेन
तथा साधुरपि न भिद्यते उपसर्गपरीषहेभ्यः ॥९५॥
जल में रहे चिरकाल पर पत्थर कभी भिदता नहीं ।
त्यों परीषह उपसर्ग से साधु कभी भिदता नहीं ॥९५॥
अन्वयार्थ : जैसे पाषाण जल में बहुत काल तक रहने पर भी भेद को प्राप्त नहीं होता है वैसे ही साधु उपसर्ग-परीषहों से नहीं भिदता है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

पाषाण ऐसा कठोर होता है कि यदि वह जल में बहुत समय तक रहे तो भी उसमें जल प्रवेश नहीं करता है, वैसे ही साधु के परिणाम भी ऐसे दृढ़ होते हैं कि-उपसर्ग-परीषह आने पर भी संयमके परिणाम से च्युत नहीं होता है और पहिले कहा जो संयम का घात जैसे न हो वैसे परीषह सहे । यदि कदाचित् संयम का घात होता जाने तो जैसे घात न हो वैसे करे ॥९५॥