
सव्वविरओ वि भावहि णव य पयत्थाइं सत्त तच्चाइं
जीवसमासाइं मुणी चउदसगुणठाणणामाइं ॥97॥
सर्व विरतः अपि भावय नव पदार्थान् सप्त तत्त्वानि
जीवसमासान् मुने ! चतुर्दशगुणस्थाननामानि ॥९७॥
है सर्वविरती तथापि तत्त्वार्थ की भा भावना ।
गुणथान जीवसमास की भी तू सदा भा भावना ॥९७॥
अन्वयार्थ : हे मुने ! तू सब परिग्रहादिक से विरक्त हो गया है, महाव्रत सहित है तो भी भाव विशुद्धि के लिये नव पदार्थ, सप्त तत्त्व, चौदह जीवसमास, चौदह गुणस्थान इनके नाम लक्षण भेद इत्यादिकों की भावना कर ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
पदार्थों के स्वरूप का चिन्तन करना भावशुद्धि का बडा़ उपाय है इसलिये यह उपदेश है । इनका नाम स्वरप अन्य ग्रंथों से जानना ॥९७॥
|