+ भावसहित आराधना के चतुष्क को पाता है, भाव बिना संसार में भ्रमण -
भावसहिदो य मुणिणो पावइ आराहणाचउक्कं च
भावरहिदो य मुणिवर भमइ चिरं दीहसंसारे ॥99॥
भावसहितश्च मुनिनः प्राप्नोति आराधनाचतुष्कं च
भावरहितश्च मुनिवर ! भ्रमति चिरं दीर्घसंसारे ॥९९॥
भाववाले साधु साधे चतुर्विध आराधना ।
पर भाव विरहित भटकते चिरकाल तक संसार में ॥९९॥
अन्वयार्थ : हे मुनिवर ! जो भाव सहित है सो दर्शन-ज्ञान-चारित्र-तप ऐसी आराधना के चतुष्क को पाता है, वह मुनियों में प्रधान है और जो भावरहित मुनि है सो बहुत काल तक दीर्घसंसार में भ्रमण करता है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

निश्चय सम्यक्त्व का शुद्ध आत्मा का अनुभूतिरूप श्रद्धान है सो भाव है, ऐसे भाव-रहित हो उसके चार आराधना होती है उसका फल अरहन्त सिद्ध पद है, और ऐसे भाव से रहित हो उसके आराधना नहीं होती हैं, उसका फल संसार का भ्रमण है । ऐसा जानकर भाव शुद्ध करना यह उपदेश है ॥९९॥