
जचंदछाबडा :
मुनि छियालीस-दोष रहित शुद्ध आहार करता है, बत्तीस अंतराय टालता है, चौदह मल-दोष रहित करता है, सो जो मुनि होकर सदोष आहार करे तो ज्ञात होता है कि इसके भाव भी शुद्ध नहीं हैं । उसको यह उपदेश है कि -- हे मुने ! तूने दोष-सहित अशुद्ध आहार किया, इसलिये तिर्यंच-गति में पहिले भ्रमण किया और कष्ट सहा, इसलिये भाव शुद्ध करके आहार कर जिसमें फिर भ्रमण न करे । छियालीस दोषों से सोलह तो उद्गम दोष हैं, वे आहार के बनने के हैं, ये श्रावक के आश्रित हैं । सोलह उत्पादन दोष हैं, ये मुनि के आश्रित हैं । दस दोष एषणा के हैं, ये आहार के आश्रित हैं । चार प्रमाणादिक हैं । इनके नाम तथा स्वरूप मूलाचार, आचारसार ग्रंथ से जानिये ॥१०१॥ |