+ भावलिंग शुद्ध करके द्रव्यलिंग सेवन का उपदेश -
सेवहि चउविहलिंगं अब्भंतरलिंगसुद्धिमावण्णो
बाहिरलिंगमकज्जं होइ फुडं भावरहियाणं ॥111॥
सेवस्व चतुर्विधलिंगं अभ्यंतरलिंगशुद्धिमापन्नः
बाह्यलिंगमकार्यं भवति स्फुटं भावरहितानाम ॥१११॥
अंतरंग शुद्धिपूर्वक तू चतुर्विध द्रवलिंग धर ।
क्योंकि भाव बिना द्रवलिंग कार्यकारी है नहीं ॥१११॥
अन्वयार्थ : हे मुनिवर ! तू अभ्यंतरलिंग की शुद्धि अर्थात् शुद्धता को प्राप्त होकर चार प्रकार के बाह्यलिंग का सेवन कर, क्योंकि जो भाव-रहित होते हैं उनके प्रगटपने बाह्य-लिंग अकार्य है अर्थात् कार्यकारी नहीं है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

जो भाव की शुद्धता से रहित हैं, जिनके अपनी आत्मा का यथार्थ श्रद्धान, ज्ञान, आचरण नहीं है, उनके बाह्य-लिंग कुछ कार्यकारी नहीं है, कारण पाकर तत्काल बिगड़ जाते हैं, इसलिये यह उपदेश है-पहिले भाव की शुद्धता करके द्रव्य-लिंग धारण करो । यह द्रव्य-लिंग चार प्रकार का कहा है, उसकी सूचना इसप्रकार है -- १-मस्तक के, २-डाढ़ी के और ३-मूछों के केशों का लोच करना, तीन चिह्न तो ये और चौथा नीचे के केश रखना; अथवा १. वस्त्र का त्याग, २. केशों का लोच करना, ३. शरीर का स्नानादि से संस्कार न करना, ४. प्रतिलेखन मयूरपिच्छि का रखना, ऐसे भी चार प्रकार का बाह्य-लिंग कहा है । ऐसे सब बाह्य वस्त्रादिक से रहित नग्न रहना, ऐसा नग्नरूप भाव-विशुद्धि बिना हँसी का स्थान है और कुछ उत्तम फल भी नहीं है ॥१११॥