
जचंदछाबडा :
संज्ञा नाम वांछा के जागते रहने (अर्थात् बने रहने) का है, सो आहार की वांछा होना, भय होना, मैथुन की वांछा होना और परिग्रह की वांछा प्राणी के निरन्तर बनी रहती है, यह जन्मान्तर में चली जाती है, जन्म लेते ही तत्काल प्रगट होती है । इसी के निमित्त से कर्मों का बंध कर संसारवन में भ्रमण करता है, इसलिये मुनियों को यह उपदेश है कि अब इन संज्ञाओं का अभाव करो ॥११२॥ |