+ चार संज्ञा का फल संसार-भ्रमण -
आहारभयपरिग्गहमेहुणसण्णाहि मोहिओ सि तुमं
भमिओ संसारवणे अणाइकालं अणप्पवसो ॥112॥
आहारभयपरिग्रहमैथुनसंज्ञाभिः मोहितः असि त्वम्
भ्रमितः संसारवने अनादिकालं अनात्मवशः ॥११२॥
आहार भय मैथुन परीग्रह चार संज्ञा धारकर ।
भ्रमा भववन में अनादिकाल से हो अन्य वश ॥११२॥
अन्वयार्थ : हे मुने ! तूने आहार, भय, मैथुन, परिग्रह, इन चार संज्ञाओं से मोहित होकर अनादिकाल से पराधीन होकर संसाररूप वन में भ्रमण किया ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

संज्ञा नाम वांछा के जागते रहने (अर्थात् बने रहने) का है, सो आहार की वांछा होना, भय होना, मैथुन की वांछा होना और परिग्रह की वांछा प्राणी के निरन्तर बनी रहती है, यह जन्मान्तर में चली जाती है, जन्म लेते ही तत्काल प्रगट होती है । इसी के निमित्त से कर्मों का बंध कर संसारवन में भ्रमण करता है, इसलिये मुनियों को यह उपदेश है कि अब इन संज्ञाओं का अभाव करो ॥११२॥