
जचंदछाबडा :
मिथ्यात्व-भाव तत्त्वार्थ का श्रद्धान-रहित परिणाम है । कषाय क्रोधादिक हैं । असंयम परद्रव्य के ग्रहणरूप है त्यागरूप भाव नहीं, इसप्रकार इन्द्रियों के विषयों से प्रीति और जीवों की विराधना सहित भाव है । योग मन-वचन-काय के निमित्त से आत्म-प्रदेशों का चलना है । ये भाव जब तीव्र कषाय सहित कृष्ण, नील, कापोत अशुभ लेश्यारूप हों तब इस जीव के पाप-कर्म का बंध होता है । पाप-बंध करनेवाला जीव कैसा है ? उसके जिन-वचन की श्रद्धा नहीं है । इस विशेषण का आशय यह है कि अन्यमत के श्रद्धानी के जो कदाचित् शुभ-लेश्या के निमित्त से पुण्य का बंध हो तो उसको पाप ही में गिनते हैं । जो जिन-आज्ञा में प्रवर्तता है उसके कदाचित् पाप भी बँधे तो वह पुण्य-जीवों की ही पंक्ति में गिना जाता है, मिथ्यादृष्टि को पापी जीवों में माना है और सम्यग्दृष्टि को पुण्यवान् जीवों में माना है । इसप्रकार पाप-बंध के कारण कहे ॥११७॥ |