
जचंदछाबडा :
पहिले कहा था कि जिन-वचन से पराङ्मुख मिथ्यात्व सहित जीव है, उससे विपरीत जिन-आज्ञा का श्रद्धानी सम्यग्दृष्टि जीव विशुद्ध-भाव को प्राप्त होकर शुभ-कर्म को बाँधता है, क्योंकि इसके सम्यक्त्व के माहात्म्य से ऐसे उज्जवल भाव हैं जिनसे मिथ्यात्व के साथ बँधनेवाली पाप-प्रकृतियों का अभाव है । कदाचित् किंचित् कोई पाप-प्रकृति बँधती है तो उसका अनुभाग मंद होता है, कुछ तीव्र पाप फल का दाता नहीं होता । इसलिये सम्यग्दृष्टि शुभ-कर्म ही को बाँधनेवाला है -- इसप्रकार शुभ-अशुभ कर्म के बंध का संक्षेप से विधान सर्वज्ञ-देव ने कहा है, वह जानना चाहिये ॥११८॥ |