
जचंदछाबडा :
आत्मा-जीव नामक वस्तु अनन्त धर्म-स्वरूप है । संक्षेप से इसकी दो परिणति हैं, एक स्वाभावाकि एक विभावरूप । इनमें स्वाभाविक तो शुद्ध दर्शन-ज्ञानमयी चेतना परिणाम है और विभाव परिणाम कर्म के निमित्त से हैं । ये प्रधानरूप से तो मोह-कर्म के निमित्त से हुए हैं । संक्षेप से मिथ्यात्व राग-द्वेष हैं, इनके विस्तार से अनेक भेद हैं । अन्य कर्मों के उदय से विभाव होते हैं उनमें पौरुष प्रधान नहीं है, इसलिये उपदेश-अपेक्षा वे गौण हैं; इसप्रकार ये शील और उत्तरगुण स्वभाव-विभाव परिणति के भेद से भेदरूप करके कहे हैं । शील की प्ररूपणा दो प्रकार की है -- एक स्वद्रव्य-परद्रव्य के विभाग की अपेक्षा है और दूसरे स्त्री के संसर्ग की अपेक्षा है । पर-द्रव्य का संसर्ग मन, वचन, काय से कृत, कारित, अनुमोदना से न करना । इनको आपस में गुणा करने से नौ भेद होते हैं । आहार, भय, मैथुन और परिग्रह ये चार संज्ञा हैं, इनसे पर-द्रव्य का संसर्ग होता है उसका न होना, ऐसे नौ भेदों को चार संज्ञाओं से गुणा करने पर छत्तीस होते हैं । पाँच इन्द्रियों के निमित्त से विषयों का संसर्ग होता है, उनकी प्रवृत्ति के अभावरूप पाँच इन्द्रियों से छत्तीस को गुणा करने पर एक सौ अस्सी होते हैं । पृथ्वी, अप्, तेज, वायु, प्रत्येक, साधारण ये तो एकेन्द्रिय और दो-इन्द्रिय, तीन-इन्द्रिय, चौइन्द्रिय, पंचेन्द्रिय ऐसे दश भेदरूप जीवों का संसर्ग, इनकी हिंसारूप प्रवर्तने से परिणाम विभावरूप होते हैं सो न करना, ऐसे एक सौ अस्सी भेदों को दससे गुणा करने पर अठारह सौ होते हैं । क्रोधादिक कषाय और असंयम परिणाम से पर-द्रव्य संबंधी विभाव-परिणाम होते हैं उनके अभावरूप दस-लक्षण धर्म है, उनसे गुणा करने से अठारह हजार होते हैं । ऐसे पर-द्रव्य के संसर्गरूप कुशील के अभावरूप शील के अठारह हजार भेद हैं । इनके पालने से परम ब्रह्मचर्य होता है, ब्रह्म (आत्मा) में प्रवर्तने और रमने को ब्रह्मचर्य कहते हैं । स्त्री के संसर्ग की अपेक्षा इसप्रकार है -- स्त्री दो प्रकार की है, अचेतन स्त्री काष्ठ पाषाण लेप (चित्राम) ये तीन, इसका मन और काय दो से संसर्ग होता है, यहाँ वचन नहीं है इसलिये दो से गुणा करने पर छह होते हैं । कृत, कारित, अनुमोदना से गुणा करने पर अठारह होते हैं । पाँच इन्द्रियों से गुणा करने पर नब्बे होते हैं । द्रव्य-भाव से गुणा करने पर एक सौ अस्सी होते हैं । क्रोध, मान, माया, लोभ इन चार कषायों से गुणा करने पर सात सौ बीस होते हैं । चेतन स्त्री देवी, मनुष्यिणी, ऐसे तीन, इन तीनों को मन, वचन, काय से गुणा करने पर नौ होते हैं । इनको कृत, कारित, अनुमोदना से गुणा करने पर सत्ताईस होते हैं । इनको पांच इन्द्रियों से गुणा करने पर एक सौ पैंतीस होते हैं । इनको द्रव्य और भाव इन दो से गुणा करने पर दो सौ सत्तर होते हैं । इनको चार संज्ञा से गुणा करने पर एक हजार अस्सी होती हैं । इनको अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण, संज्वलन क्रोध मान माया लोभ इन सोलह कषायों से गुणा करने पर सत्रह हजार दो सौ अस्सी होते हैं । ऐसे अचेतन-स्त्री के सात सौ बीस मिलाने पर अठारह हजार होते हैं । ऐसे स्त्री के संसर्ग से विकार परिणाम होते हैं सौ कुशील है, इनके अभावरूप परिणाम शील है इसकी भी ब्रह्मचर्य संज्ञा है । * अचेतन : स्त्री काष्ठ, पाषाण चित्राम मन काय कृत कारित अनुमोदना इन्द्रियाँ ५ द्रव्यभाव क्रोध, मान, माया, लोभ ३ x २ x ३ x ५ x २ x ४ = ७२० चेतन : देवी स्त्री मनुष्याणी तिर्यंचिणी मन वचन काय कृत कारित अनुमोदना इन्द्रियाँ ५ द्रव्य भाव अनंतानुबंधी आहार परिग्रह भय, मैथुन प्रत्याख्यानावरण संज्वलन मान, माया, लोभ ३ x ३ x ३ x ५ x २ x ४ X ४ x ४ = १७२८० /१८००० चौरासी लाख उत्तरगुण ऐसे हैं जो आत्मा के विभावपरिणाम के बाह्यकारणों की अपेक्षा भेद होते हैं । उनके अभावरूप ये गुणों के भेद हैं । उन विभावों के भेदों की गणना संक्षेप से ऐसे है -- १-हिंसा २-अनृत ३-स्तेय ४-मैथुन ५-परिग्रह ६-क्रोध ७-मान ८-माया ९-लोभ १०-भय, ११-जुगुप्सा १२-अरति १३-शोक १४-मनोदुष्टत्व १५-वचनदुष्टत्व १६-कायदुष्टत्व १७-मिथ्यात्व १८-प्रमाद १९-पैशून्य २०-अज्ञान २१-इन्द्रियका अनुग्रह ऐसे इक्कीस दोष हैं । इनको अतिक्रम, व्यतिक्रम, अतिचार, अनाचार इन चारों से गुणा करने पर चौरासी होते हैं । पृथ्वी-अप्-तेज-वायु प्रत्येक साधारण ये स्थावर एकेन्द्रिय जीव छह और विकल तीन, पंचेंद्रिय एक ऐसे जीवों के दस भेद, इनका परस्पर आरंभ से घात होता है इनको परस्पर गुणा करने पर भी सौ (१००) होते हैं । इनसे चौरासी को गुणा करने पर चौरासी सौ होते हैं, इनको दस शील-विराधने से गुणा करने पर चौरासी हजार होते हैं । इन दस के नाम ये हैं १ स्त्री-संसर्ग, २ पुष्ट-रस-भोजन, ३ गंध-माल्य का ग्रहण, ४ सुन्दर शयनासन का ग्रहण, ५ भूषण का मंडन, ६ गीतवादित्र का प्रसंग, ७ धन का संप्रयोजन, ८ कुशील का संसर्ग, ९ राज-सेवा, १० रात्रि-संचरण ये शील-विराधना हैं । इनके आलोचना के दस दोष हैं -- गुरुओं के पास लगे हुए दोषों की आलोचना करे सो सरल होकर न करे कुछ शल्य रखे, उसके दस भेद किये हैं, इनसे गुणा करने पर आठ लाख चालीस हजार होते हैं । आलोचना को आदि देकर प्रायश्चित्त के दस भेद हैं इनसे गुणा करने पर चौरासी लाख होते हैं । सो सब दोषों के भेद हैं, इनके अभाव से गुण होते हैं । इनकी भावना रखे, चिन्तवन और अभ्यास रखे, इनकी संपूर्ण प्राप्ति होने का उपाय रखे; इसप्रकार इनकी भावना का उपदेश है । आचार्य कहते हैं कि बारबार बहुत वचन के प्रलाप से तो कुछ साध्य नहीं हैं, जो कुछ आत्मा के भाव की प्रवृत्ति के व्यवहार के भेद हैं इनकी गुण संज्ञा है, उनकी भावना रखना । यहाँ इतना और जानना कि गुणस्थान चौदह कहे हैं, उस परिपाटी से गुण-दोषों का विचार है । मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र इन तीनों में तो विभाव परिणति ही है, इनमें तो गुण का विचार ही नहीं है । अविरत, देशविरत आदि में शीलगुण का एकदेश आता है । अविरत में मिथ्यात्व / अनन्तानुबन्धी कषाय के अभावरूप गुण का एकदेश सम्यक्त्व और तीव्र राग-द्वेष का अभावरूप गुण आता है और देशविरत में कुछ व्रत का एकदेश आता है । प्रमत्त में महाव्रत रूप सामायिक चारित्र का एकदेश आता है क्योंकि पाप संबंधी राग-द्वेष तो वहाँ नहीं है, परन्तु धर्म-सम्बन्धी राग है और सामायिक राग-द्वेष के अभाव का नाम है, इसीलिये सामायिक का एकदेश ही कहा है । यहाँ स्वरूप के सन्मुख होने में क्रियाकांड के सम्बंध से प्रमाद है, इसलिये प्रमत्त नाम दिया है । अप्रमत्त में स्वरूप साधन में तो प्रमाद नहीं है, परन्तु कुछ स्वरूप के साधने का राग व्यक्त है, इसलिये यहाँ भी सामायिक का एकदेश ही कहा है । अपूर्वकरण-अनिवृत्तिकरण में राग व्यक्त नहीं है, अव्यक्त-कषाय का सद्भाव है, इसलिये सामायिक चारित्र की पूर्णता कही । सूक्ष्मसंपराय में अव्यक्त कषाय भी सूक्ष्म रह गई, इसलिये इसका नाम सूक्ष्मसंपराय रखा । उपशान्तामोह क्षीणमोह में कषाय का अभाव ही है, इसलिये जैसा आत्मा का मोह-विकार-रहित शुद्ध स्वरूप था उसका अनुभव हुआ, इसलिये यथाख्यात-चारित्र नाम रखा । ऐसे मोह-कर्म के अभाव की अपेक्षा तो यहाँ ही उत्तर-गुणों की पूर्णता कही जाती है, परन्तु आत्मा का स्वरूप अनन्त-ज्ञानादि स्वरूप है सो घाति-कर्म के नाश होनेपर अनन्त-ज्ञानादि प्रगट होते हैं तब सयोग-केवली कहते हैं । इसमें भी कुछ योगों की प्रवृत्ति है, इसलिये अयोग-केवली चौदहवाँ गुणस्थान है । इसमें योगों की प्रवृत्ति मिट कर आत्मा अवस्थित हो जाती है तब चौरासी लाख उत्तरगुणों की पूर्णता कही जाती है । ऐसे गुणस्थानों की अपेक्षा उत्तर-गुणों की प्रवृत्ति विचारने योग्य है । ये बाह्य अपेक्षा भेद हैं, अंतरंग अपेक्षा विचार करें तो संख्यात, असंख्यात, अनन्त भेद होते हैं, इसप्रकार जानना चाहिये ॥१२०॥ |