
जचंदछाबडा :
अपने को कर्मों से वेष्ठित माने और उनसे अनन्त-ज्ञानादि गुण आच्छादित माने तब उन कर्मों के नाश करने का विचार करे, इसलिये कर्मों के बंध की और उनके अभाव की भावना करने का उपदेश है । कर्मों का अभाव शुद्ध-स्वरूप के ध्यान से होता है, उसीके करने का उपदेश है । कर्म आठ हैं -- १-ज्ञानावरण, २-दर्शनावरण, ३-मोहनीय, ४-अंतराय ये चार घातिया कर्म हैं, इनकी प्रकृति सैंतालीस हैं, केवल-ज्ञानावरण से अनन्तज्ञान आच्छादित है, केवल-दर्शनावरण से अनन्त-दर्शन आच्छादित है, मोहनीय से अनन्त-सुख प्रगट नहीं होता है और अंतराय से अनन्त-वीर्य प्रगट नहीं होता है, इसलिये इनका नाश करो । चार अघाति-कर्म हैं इनसे अव्याबाध, अगुरुलघु, सूक्ष्मता और अवगाहना ये गुण (-की निर्मल पर्याय) प्रगट नहीं होते हैं, इन अघाति-कर्मों की प्रकृति एक सौ एक हैं । घाति-कर्मों का नाश होने पर अघाति-कर्मों का स्वयमेव अभाव हो जाता है, इसप्रकार जानना चाहिये ॥११६॥ |