
जचंदछाबडा :
जैसे निर्मल और शीतल जलके पीने से पीत्त की दाहरूप व्याधि मिटकर साता होती है, वैसे ही यह ज्ञान है वह जब रागादिक मल से रहित निर्मल और आकुलता रहित शांत-भाव स्वरूप होता है, उसकी भावना कर रुचि, श्रद्धा, प्रतीति से पीवे, इससे तन्मय हो तो जरा-मरणरूप दाह-वेदना मिट जाती है और संसार से निर्वृत्त होकर सुखरूप होता है, इसलिये भव्य जीवों को यह उपदेश है कि ज्ञान में लीन होओ ॥१२५॥ |