+ ज्ञान के अनुभवन का उपदेश -
णाणमयविमलसीयलसलिलं पाऊण भविय भावेण
बाहिजरमरणवेयणडाहविमुक्का सिवा होंति ॥125॥
ज्ञानमयविमलशीतलसलिलं प्राप्य भव्याः भावेन
व्याधिजरामरणवेदनादाह विमुक्ताः शिवाः भवन्ति ॥१२५॥
आनन्दमय मृतु जरा व्याधि वेदना से मुक्त जो ।
वह ज्ञानमय शीतल विमल जल पियो भविजन भाव से ॥१२५॥
अन्वयार्थ : भव्य-जीव ज्ञानमयी निर्मल शीतल जल को सम्यक्त्वभाव सहित पीकर और व्याधि-स्वरूप जरा-मरण की वेदना (पीड़ा) को भस्म करके मुक्त अर्थात् संसार से रहित 'शिव' अर्थात् परमानंद सुखरूप होते हैं ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

जैसे निर्मल और शीतल जलके पीने से पीत्त की दाहरूप व्याधि मिटकर साता होती है, वैसे ही यह ज्ञान है वह जब रागादिक मल से रहित निर्मल और आकुलता रहित शांत-भाव स्वरूप होता है, उसकी भावना कर रुचि, श्रद्धा, प्रतीति से पीवे, इससे तन्मय हो तो जरा-मरणरूप दाह-वेदना मिट जाती है और संसार से निर्वृत्त होकर सुखरूप होता है, इसलिये भव्य जीवों को यह उपदेश है कि ज्ञान में लीन होओ ॥१२५॥