
जचंदछाबडा :
संसार के बीज 'ज्ञानावरणादि' कर्म हैं । ये कर्म भाव-श्रमण के ध्यानरूप अग्नि से भस्म हो जाते हैं, इसलिये फिर संसाररूप अंकुर किससे हो ? इसलिये भाव-श्रमण होकर धर्म-शुक्ल-ध्यान से कर्मों का नाश करना योग्य है, यह उपदेश है । कोई सर्वथा एकांती अन्यथा कहे कि -- कर्म अनादि है, उसका अंत भी नहीं है, उसका भी यह निषेध है । बीज अनादि है वह एक बार दग्ध हो जाने पर पीछे फिर नहीं उगता है, उसी तरह इसे जानना ॥१२६॥ |