
जचंदछाबडा :
सम्यग्दर्शन-सहित भाव-श्रमण होता है, वह संसार का अभाव करके सुखों को पाता है और मिथ्यात्व-सहित द्रव्य-श्रवण भेष-मात्र होता है, यह संसार का अभाव नहीं कर सकता है, इसलिये दुःखों को पाता है । अतः उपदेश करते हैं कि दोनों के गुण-दोष जानकर भाव-संयमी होना योग्य है, यह सब उपदेश का सार है ॥१२७॥ |