
जचंदछाबडा :
अनादिकाल से जीव का स्वरूप चेतना-स्वरूप न जाना इसलिये जीवों की हिंसा की, अतः यह उपदेश है कि -- अब जीवात्मा का स्वरूप जानकर, छहकाय के जीवों पर दया कर । अनादि ही से आप्त, आगम, पदार्थ का और इनकी सेवा करनेवालों का स्वरूप जाना नहीं, इसलिये अनाप्त आदि छह अनायतन जो मोक्षमार्ग के स्थान नहीं हैं उनको अच्छे समझकर सेवन किया, अतः यह उपदेश है कि अनायतन का परिहार कर । जीव के स्वरूप के उपदेशक ये दोनों ही तूने पहिले जाने नही, न भावना की, इसलिये अब भावना कर, इसप्रकार उपदेश है ॥१३३॥ |