
दसविहपाणाहारो अणंतभवसायरे भमंतेण
भोयसुहकारणट्ठं कदो य तिविहेण सयलजीवाणं ॥134॥
दशविधप्राणाहारः अनन्तभवसायरे भ्रमता
भोगसुखकारणार्थं कृतश्च त्रिविधेन सकलजीवानां ॥१३४॥
भवभ्रमण करते आजतक मन-वचन एवं काय से ।
दश प्राणों का भोजन किया निज पेट भरने के लिये ॥१३४॥
अन्वयार्थ : हे मुने ! तूने अनंतभवसागर में भ्रमण करते हुए, सकल त्रस, स्थावर, जीवोंके दश प्रकार के प्राणों का आहार, भोग-सुख के कारण के लिये मन, वचन, काय से किया ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
अनादिकाल से जिनमत के उपदेश के बिना अज्ञानी होकर तूने त्रस, स्थावर जीवों के प्राणों का आहार किया इसलिये अब जीवोंका स्वरूप जानकर जीवों की दया पाल, भोग-विलास छोड़, यह उपदेश है ॥१३४॥
|