+ दया का उपदेश -
जीवाणमभयदाणं देहि मुणी पाणिभूयसत्ताणं
कल्लाणसुहणिमित्तं परंपरा तिविहसुद्धीए ॥136॥
जीवानामभयदानं देहि मुने प्राणिभूतसत्त्वानाम्
कल्याणसुखनिमित्तं परंपरया त्रिविधशुद्ध्या ॥१३६॥
यदि भवभ्रमण से ऊबकर तू चाहता कल्याण है ।
तो मन वचन अर काय से सब प्राणियों को अभय दे ॥१३६॥
अन्वयार्थ : हे मुने ! जीवों को और प्राणीभूत सत्त्वों को अपना परंपरा से कल्याण और सुख होने के लिये मन, वचन, काय की शुद्धता से अभयदान दे ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

जीव पंचेन्द्रियों को कहते हैं, 'प्राणी' विकलत्रय को कहते हैं, 'भूत' वनस्पति को कहते हैं और 'सत्त्व' पृथ्वी अप् तेज वायु को कहते हैं । इन सब जीवों को अपने समान जानकर अभयदान देने का उपदेश है । इससे शुभ प्रकृतियों का बंध होने से अभ्युदय का सुख होता है, परम्परासे तीर्थंकर-पद पाकर मोक्ष पाता है, यह उपदेश है ॥१३६॥