+ प्राणि-हिंसा से संसार में भ्रमण कर दुःख पाया -
पाणिवहेहि महाजस चउरासीलक्खजोणिमज्झम्मि
उप्पजंत मरंतो पत्तो सि णिरंतरं दुक्खं ॥135॥
प्राणिवधैः महायशः चतुरशीतिलक्षयोनिमध्ये
उत्पद्यमानः म्रियमाणः प्राप्तोsसि निरंतरं दुःखम् ॥१३५॥
इन प्राणियों के घात से योनी चौरासी लाख में ।
बस जन्मते मरते हुये, दुख सहे तूने आजतक ॥१३५॥
अन्वयार्थ : हे मुने ! हे महायश ! तूने प्राणियों के घातसे चौरासी लाख योनियों के मध्यमें उत्पन्न होते हुए और मरते हुए निरंतर दुःख पाया ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

जिनमत के उपदेश के बिना, जीवों की हिंसा से यह जीव चौरासी लाख योनियों में उत्पन्न होता है और मरता है । हिंसा से कर्म-बंध होता है, कर्म-बन्ध के उदय से उत्पत्ति--मरणरूप संसार होता है । इसप्रकार जन्म-मरण के दुःख सहता है, इसलिये जीवों की दया का उपदेश है ॥१३५॥