
जचंदछाबडा :
यहाँ जीव नामक पदार्थ के छह विशेषण कहे । इनका आशय ऐसा है कि- १-'कर्ता' कहा, वह निश्चयनय में तो अपने अशुद्ध भावों का अज्ञान अवस्था में आप ही कर्त्ता है तथा व्यवहार-नय से ज्ञानावरणादि पुद्गल कर्मों का कर्त्ता है और शुद्धनय से अपने शुद्धभावों का कर्त्ता है । २-'भोक्ता' कहा, वह निश्चयनय से तो अपने ज्ञान--दर्शनमयी चेतनाभाव का भोक्ता है और व्यवहार नयसे पुद्गल-कर्म के फल जो सुख--दुःख आदि का भोक्ता है । ३-'अमूर्तिक' कहा, वह निश्चय से तो स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण, शब्द ये पुद्गल के गुण--पर्याय हैं, इनसे रहित अमूर्तिक है और व्यवहार से जबतक पुद्गल-कर्म से बँधा है तब तक 'मूर्तिक' भी कहते हैं । ४-'शरीरपरिमाण' कहा, यह निश्चय से तो असंख्यात-प्रदेशी लोक-परिणाम हैं, परन्तु संकोच-विस्तार शक्ति से शरीर से कुछ-कम प्रदेशप्रमाण आकार में रहता है । ५-'अनादिनिधन' कहा, वह पर्याय-दृष्टि से देखने पर तो उत्पन्न होता है, नष्ट होता है, तो भी द्रव्य-दृष्टि से देखा जाय तो अनादि-निधन सदा नित्य अविनाशी है । ६-'दर्शन-ज्ञान-उपयोग सहित' कहा, वह देखने-जाननरूप उपयोग-स्वरूप चेतनारूप है । इन विशेषणों से अन्यमती अन्य प्रकार सर्वथा एकान्तरूप मानते हैं उनका निषेध भी जानना चाहिये । 'कर्त्ता' विशेषण से तो सांख्यमती सर्वथा अकर्त्ता मानता है उसका निषेध है । 'भोक्ता' विशेषण से बौद्धमती क्षणिक मानकर कहता है कि कर्म को करनेवाला तो और है तथा भोगनेवाला और है इसका निषेध है । जो जीव कर्म करता है उसका फल वही जीव भोगता है, इस कथन से बौद्धमती के कहने का निषेध है । 'अमूर्तिक' कहने से मीमांसक आदि इस शरीर-सहित मूर्तिक ही मानते हैं, उनका निषेध है । 'शरीर-प्रमाण' कहने से नैयायिक, वैशेषिक, वेदान्ती आदि सर्वथा, सर्वव्यापक, मानते हैं उनका निषेध है । 'अनादि-निधन' कहने से बौद्धमती सर्वथा क्षण-स्थायी मानता है, उसका निषेध है । 'दर्शन-ज्ञान-उपयोगमयी' कहने से सांख्यमती तो ज्ञान-रहित चेतनामात्र मानता है, नैयायिक, वैशेषिक, गुणगुणी के सर्वथा भेद मानकर ज्ञान और जीव के सर्वथा भेद मानते हैं, बौद्धमत का विशेष विज्ञान-द्वैतवादी ज्ञान-मात्र ही मानता है और वेदांती ज्ञान का कुछ निरूपण ही नहीं करता है, इन सबका निषेध है । इसप्रकार सर्वज्ञ का कहा हुआ जीव का स्वरूप जानकर अपने को ऐसा मानकर श्रद्धा, रुचि, प्रतीति करना चाहिये । जीव कहने से अजीव पदार्थ भी जाना जाता है, अजीव न हो तो जीव नाम कैसे होता ? इसलिये अजीव का स्वरूप कहा है, वैसाही उसका श्रद्धान आगम-अनुसार करना । इसप्रकार अजीव पदार्थ का स्वरूप जानकर और इन दोनों के संयोग से अन्य आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष इन भावोंकी प्रवृत्ति होती है । इनका आगम के अनुसार स्वरूप जानकर श्रद्धान करने से सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है, इसप्रकार जानना चाहिये ॥१४८॥ |