
दंसणणाणावरणं मोहणियं अंतराइयं कम्मं
णिट्ठवइ भवियजीवो सम्मं जिणभावणाजुत्तो ॥149॥
दर्शनज्ञानावरणं मोहनीयं अन्तरायकं कर्म
निष्ठापयति भव्यजीवाः सम्यक् जिनभावनायुक्तः ॥१४९॥
जिन भावना से सहित भवि दर्शनावरण-ज्ञानावरण ।
अर मोहनी अन्तराय का जड़ मूल से मर्दन करें ॥१४९॥
अन्वयार्थ : सम्यक् प्रकार जिनभावना से युक्त भव्यजीव है वह ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अन्तराय, इन चार घातिया कर्मोंका निष्ठापन करता है अर्थात् सम्पूर्ण अभाव करता है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
दर्शन का घातक दर्शनावरण कर्म है, ज्ञान का घातक ज्ञानावरण कर्म है, सुख का घातक मोहनीय कर्म है, वीर्य का घातक अन्तराय कर्म है । इनका नाश कौन करता है ? सम्यक्प्रकार जिन-भावना भाकर अर्थात् जिन आज्ञा मानकर जीव-अजीव आदि तत्त्व का यथार्थ निश्चय कर श्रद्धावान हुआ हो वह जीव करता है । इसलिये जिन आज्ञा मान कर यथार्थ श्रद्धान करो यह उपदेश है ॥१४९॥
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