
जचंदछाबडा :
'ज्ञानी' कहने से सांख्यमती ज्ञानरहित उदासीन चैतन्यमात्र मानता है उसका निषेध है । 'शिव' है अर्थात् सब कल्याणों से परिपूर्ण है, जैसा सांख्य-मती नैयायिक वैशेषिक मानते हैं वैसा नहीं है । परमेष्ठी है सो परम (उत्कृष्ट) पदमें स्थित है अथवा उत्कृष्ट इष्टत्व स्वभाव है । जैसे अन्यमती कई अपना इष्ट कुछ मान करके उसको परमेष्ठी कहते हैं वैसे नहीं है । 'सर्वज्ञ' है अर्थात् सब लोकालोक को जानता है, अन्य कितने ही किसी एक प्रकरण संबंधी सब बात जानता है उसको भी सर्वज्ञ कहते हैं वैसे नहीं है । 'विष्णु' है अर्थात् जिसका ज्ञान सब ज्ञेयों में व्यापक है-अन्यमती वेदांती आदि कहते हैं कि पदार्थों में आप है तो ऐसा नहीं है । 'चतुर्मुख' कहने से केवली अरहंत के समवसरण में चार मुख चारों दिशाओं में दिखते हैं ऐसा अतिशय है, इसलिये चतुर्मुख कहते हैं -- अन्यमती ब्रह्मा को चतुर्मुख कहते हैं ऐसा ब्रह्मा कोई नहीं है । 'बुद्ध' है अर्थात् सबका ज्ञाता है -- बौद्धमती क्षणिक को बुद्ध कहते हैं वैसा ही नहीं है । 'आत्मा' है अपने स्वभाव ही में निरन्तर प्रवर्तता है -- अन्यमती वेदान्ती सब में प्रवर्तते हुए आत्मा को मानते हैं वैसा नहीं है । 'परमात्मा' है अर्थात् आत्मा को पूर्णरूप 'अनन्त-चतुष्टय' उसके प्रगट हो गये हैं, इसलिये परमात्मा है । कर्म जो आत्मा के स्वभाव के घातक घातिया कर्मों से रहित हो गये हैं इसलिये 'कर्म विमुक्त' हैं, अथवा कुछ करने योग्य काम न रहा इसलिये भी कर्म-विमुक्त है । सांख्यमती, नैयायिक सदा ही कर्म रहित मानते हैं वैसे नहीं है । ऐसे परमात्मा के सार्थक नाम हैं । अन्यमती अपने इष्ट का नाम एकही कहते हैं, उनका सर्वथा एकान्त के अभिप्राय के द्वारा अर्थ बिगड़ता है इसलिये यथार्थ नहीं है । अरहन्त के ये नाम नय विवक्षासे सत्यार्थ हैं, ऐसा जानो ॥१५१॥ |