+ अरिहंत भगवान मुझे उत्तम बोधि देवे -
इय घाइकम्ममुक्को अट्ठारहदोसवज्जिओ सयलो
तिहुवणभवणपदीवो देउ ममं उत्तमं बोहिं ॥152॥
इति घातिकर्ममुक्तः अष्टादशदोषवर्जितः सकलः
त्रिभुवनभवनप्रदीपः ददातु मह्यं उत्तमां बोधिम् ॥१५२॥
घन-घाति कर्म विमुक्त अर त्रिभुवनसदन संदीप जो ।
अर दोष अष्टादश रहित वे देव उत्तम बोधि दें ॥१५२॥
अन्वयार्थ : इसप्रकार घातिया कर्मों से रहित, क्षुधा, तृषा आदि पूर्वोक्त अठारह दोषों से रहित, सकल (शरीरसहित) और तीन भुवनरूपी भवन को प्रकाशित करनेके लिए प्रकृष्ट दीपकतुल्य देव हैं, वह मुझे उत्तम बोधि (सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र) की प्राप्ति देवे, इस प्रकार आचार्य ने प्रार्थना की है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

यहाँ और तो पूर्वोक्त प्रकार जानना, परन्तु 'सकल' विशेषण का यह आशय है कि -- मोक्षमार्ग की प्रवृत्ति करने के जो उपदेश हैं वह वचन के प्रवर्ते बिना नहीं होते हैं और वचनकी प्रवृत्ति शरीर बिना नहीं होती है, इसलिये अरहंत का आयु-कर्म के उदय से शरीर सहित अवस्थान रहता है और सुस्वर आदि नाम-कर्म के उदय से वचन की प्रवृत्ति होती है । इस तरह अनेक जीवों का कल्याण करनेवाला उपदेश होता रहता है । अन्यमतियों के ऐसा अवस्थान (ऐसी स्थिति) परमात्मा के संभव नहीं है, इसलिये उपदेश की प्रवृत्ति नहीं बनती है, तब मोक्ष-मार्ग का उपदेश भी नहीं बनता है, इसप्रकार जानना चाहिये ॥१५२॥