
मायावेल्लि असेसा मोहमहातरुवरम्मि आरूढा
विसयविसपुप्फफुल्लिय लुणंति मुणि णाणसत्थेहिं ॥158॥
मायावल्लीं अशेषां मोहमहातरुवरे आरूढाम्
विषयविषपुष्पपुष्पितां लुनंति मुनयः ज्ञानशस्त्रैः ॥१५८॥
पुष्पित विषयमय पुष्पों से अर मोहवृक्षारूढ़ जो ।
अशेष माया बेलि को मुनि ज्ञानकरवत काटते ॥१५८॥
अन्वयार्थ : माया रूपी वेल जो मोहरूपी वृक्ष पर चढ़ी हुई है तथा विषयरूपी विष के फूलों से फूल रही है उसको मुनि ज्ञानरूपी शस्त्र से समस्ततया काट डालते हैं अर्थात् निःशेष कर देते हैं ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
यह माया-कषाय मूढ़ है, इसका विस्तार भी बहुत है, मुनियों तक फैलती है, इसलिये जो मुनि ज्ञान से इसको काट डालते हैं वे ही सच्चे मुनि हैं, वे ही मोक्ष पाते हैं ॥१५८॥
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