
जचंदछाबडा :
पर-द्रव्य से ममत्वभाव को 'मोह' कहते हैं । 'मद' - जाति आदि पर-द्रव्य के संबंध से गर्व होने को 'मद' कहते हैं । गौरव तीन प्रकार का है -- ऋद्धि-गौरव, सात-गौरव और रस-गौरव । जो कुछ तपोबल से अपनी महंतता लोक में हो उसका अपने को मद आवे, उसमें हर्ष माने वह 'ऋद्धि-गौरव' है । यदि अपने शरीर में रोगादिक उत्पन्न न हों तो सुख माने तथा प्रमाद-युक्त होकर अपना महंतपना माने सात-गौरव है । यदि मिष्ट-पुष्ट रसीला आहारादिक मिले तो उसके निमित्त से प्रमत्त होकर शयनादिक करे 'रस-गौरव' है । मुनि इसप्रकार गौरव से तो रहित हैं और पर-जीवों की करुणा से सहित हैं; ऐसा नहीं है कि पर-जीवों से मोह-ममत्व नहीं है इसलिये निर्दय होकर उनको मारते हैं, परन्तु जब तक राग-अंश रहता है तब तक पर जीवों की करुणा ही करते हैं, उपकार-बुद्धि रहती है । इसप्रकार ज्ञानी मुनि पाप जो अशुभ-कर्म उसका चारित्र के बल से नाश करते हैं ॥१५९॥ |