
जचंदछाबडा :
जो जिन-भावना से भावित जीव हैं वे ही सिद्धि अर्थात् मोक्ष के सुख को पाते हैं । कैसा है सिद्धि-सुख ? 'शिव' है, कल्याणरूप है, किसी प्रकार उपद्रव सहित नहीं है, 'अजरामरलिंग' है अर्थात् जिसका चिह्न वृद्ध होना और मरना इन दोनों से रहित है, 'अनुपम' है, जिसको संसार के सुख की उपमा नहीं लगती है, 'उत्तम' (सर्वोत्तम) है, 'परम' (सर्वोत्कृष्ट) है, महार्घ्य है अर्थात् महान् अर्घ्य-पूज्य प्रशंसा के योग्य है, 'विमल' है कर्म के मल तथा रागादिकमल से रहित है । 'अतुल' है, इसके बराबर संसार का सुख नहीं है, ऐसे सुख को जिन--भक्त पाता है, अन्य का भक्त नहीं पाता है ॥१६२॥ |