+ भाव के कथन का संकोच -
किं जंपिएण बहुणा अत्थो धम्मो यकाममोक्खो य
अण्णे वि य वावारा भावम्मि परिट्ठिया सव्वे ॥164॥
किं जल्पितेन बहुना अर्थः धर्मः च काममोक्षः च
अन्ये अपि च व्यापाराः भावे परिस्थिताः सर्वे ॥१६४॥
इससे अधिक क्या कहें हम धर्मार्थकाम रु मोक्ष में ।
या अन्य सब ही कार्य में है भाव की ही मुख्यता ॥१६४॥
अन्वयार्थ : आचार्य कहते हैं कि बहुत कहने से क्या ? धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और अन्य जो कुछ व्यापार है वह सब ही शुद्धभाव में समस्तरूप से स्थित है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

पुरुष के चार प्रयोजन प्रधान हैं -- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष । अन्य भी जो कुछ मंत्र-साधनादिक व्यापार हैं, वे आत्मा के शुद्ध चैतन्य-परिणाम-स्वरूप भाव में स्थित हैं । शुद्ध-भाव से सब सिद्धि है, इसप्रकार संक्षेप से कहना जानो, अधिक क्या कहें ? ॥१६४॥