+ भावपाहुड़ को पढ़ने-सुनने व भावना करने का उपदेश -
इय भावपाहुडमिणं सव्वंबुद्धेहि देसियं सम्मं
जो पढइ सुणइ भावइ सो पावइ अविचलं ठाणं ॥165॥
इति भावप्राभृतमिदं सर्वबुद्धैः देशितं सम्यक्
यः पठति श्रृणोति भावयति सः प्राप्नोति अविचलं स्थानम् ॥१६५॥
इस तरह यह सर्वज्ञ भासित भावपाहुड जानिये ।
भाव से जो पढ़ें अविचल थान को वे पायेंगे ॥१६५॥
अन्वयार्थ : इसप्रकार इस भावपाहुड का सर्वबुद्ध-सर्वज्ञदेव ने उपदेश दिया है, इसको जो भव्यजीव सम्यक्प्रकार पढ़ते हैं, सुनते हैं और इसका चिन्तन करते हैं वे शाश्वत सुख के स्थान मोक्ष को पाते हैं ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

यह भाव-पाहुड ग्रंथ सर्वज्ञ की परंपरा से अर्थ लेकर आचार्य ने कहा है, इसलिये सर्वज्ञ का ही उपदेश है, केवल छद्मस्थ का ही कहा हुआ नहीं है, इसलिये आचार्य ने अपना कर्त्तव्य प्रधानकर नहीं कहा है । इसके पढ़ने-सुनने का फल मोक्ष कहा, वह युक्त ही है । शुद्ध-भाव से मोक्ष होता है और इसके पढ़ने से शुद्ध-भाव होते हैं । इसप्रकार इसका पढ़ना, सुनना, धारण और भावना करना परंपरा मोक्ष का कारण है । इसलिये हे भव्य-जीवों ! इस भावपाहुड़ को पढ़ो, सुनो, सुनाओ, भावो और निरन्तर अभ्यास करो जिससे भाव शुद्ध हों और सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की पूर्णता को पाकर मोक्ष को प्राप्त करो तथा वहाँ परमानंदरूप शाश्वत सुख को भोगो ।

इसप्रकार श्री कुन्दकुन्द नामक आचार्य ने भाव-पाहुड़ ग्रंथ पूर्ण किया ।

इसका संक्षेप ऐसे हैं -- जीव नामक वस्तु का एक असाधारण शुद्ध अविनाशी चेतना स्वभाव है । इसकी शुद्ध, अशुद्ध दो परिणति हैं । शुद्ध दर्शन-ज्ञानोपयोगरूप परिणमना 'शुद्ध परिणति' है, इसको शुद्ध-भाव कहते हैं । कर्म के निमित्त से राग-द्वेष-मोहादिक विभावरूप परिणमना 'अशुद्ध परिणति' है, इसको अशुद्ध-भाव कहते हैं । कर्म का निमित्त अनादि से है इसलिये अशुद्ध-भावरूप अनादि ही में परिणमन कर रहा है । इस भाव से शुभ-अशुभ कर्म का बंध होता है, इस बंध के उदय से फिर शुभ या अशुभ भावरूप (अशुद्ध भावरूप) परिणमन करता है, इसप्रकार अनादि संतान चला आता है । जब इष्ट देवतादिक की भक्ति, जीवों की दया, उपकार, मंद-कषायरूप परिणमन करता है तब तो शुभ-कर्म का बंध करता है; इसके निमित्त से देवादिक पर्याय पाकर कुछ सुखी होता है । जब विषय-कषाय तीव्र परिणामरूप परिणमन करता है तब पाप का बंध करता है, इसके उदयमें नरकादिक पर्याय पाकर दुःखी होता है ।

इसप्रकार संसार में अशुद्ध-भाव से अनादिकाल से यह जीव भ्रमण करता है । जब कोई काल ऐसा आवे जिसमें जिनेश्वरदेव-सर्वज्ञ वीतराग के उपदेश को प्राप्ति हो और उसका श्रद्धान रुचि प्रतीति आचरण करे तब स्व और पर का भेद-ज्ञान करके शुद्ध-अशुद्ध भाव का स्वरूप जानकर अपने हित-अहित का श्रद्धान रुचि प्रतीति आचरण हो तब शुद्ध-दर्शन-ज्ञानमयी शुद्ध चेतना परिणमन को तो 'हित' जाने, इसका फल संसार की निवृत्ति है इसको जाने, और अशुद्ध-भाव का फल संसार है इसको जाने, तब शुद्ध-भाव के ग्रहण का और अशुद्ध-भाव के त्याग का उपाय करे । उपाय का स्वरूप जैसे सर्वज्ञ-वीतराग के आगम में कहा है, वैसे करे ।

इसका स्वरूप निश्चय-व्यवहारात्मक सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र स्वरूप मोक्ष-मार्ग कहा है । शुद्ध-स्वरूप के श्रद्धान-ज्ञान-चारित्र को 'निश्चय' कहा है और जिनदेव सर्वज्ञ-वीतराग तथा उनके वचन और उन वचनों के अनुसार प्रवर्तने वाले मुनि श्रावक उनकी भक्ति वन्दना विनय वैयावृत्य करना 'व्यवहार' है, क्योंकि यह मोक्ष-मार्ग में प्रवर्ताने को उपकारी है । उपकारी का उपकार मानना न्याय है, उपकार लोपना अन्याय है । स्वरूप के साधक अहिंसा आदि महाव्रत तथा रत्नत्रय रूप प्रवृत्ति, समिति, गुप्तिरूप प्रवर्तना और इनमें दोष लगने पर अपनी निंदा गर्हादिक करना, गुरुओं का दिया हुआ प्रायश्चित्त लेना, शक्ति के अनुसार तप करना, परिग्रह सहना, दसलक्षण-धर्म में प्रवर्तना इत्यादि शुद्धात्मा के अनुकूल क्रियारूप प्रवर्तना, इनमें कुछ राग का अंश रहता है तबतक शुभ-कर्म का बंध होता है, तो भी वह प्रधान नहीं है, क्योंकि इनमें प्रवर्तनेवाले के शुभ-कर्म के फल की इच्छा नहीं हैं, इसलिये अबंध तुल्य है, इत्यादि प्रवृत्ति आगमोक्त 'व्यवहार-मोक्षमार्ग' है । इसमें प्रवृत्तिरूप परिणाम हैं तो भी निवृत्ति प्रधान है, इसलिये निश्चय-मोक्षमार्ग में विरोध नहीं है ।

इसप्रकार निश्चय-व्यवहार स्वरूप मोक्ष-मार्ग का संक्षेप है । इसी को 'शुद्धभाव' कहा है । इसमें भी सम्यग्दर्शन को प्रधान कहा है, क्योंकि सम्यग्दर्शन के बिना सब व्यवहार मोक्ष का कारण नहीं है और सम्यग्दर्शन के व्यवहार में जिनदेव की भक्ति प्रधान है, यह सम्यग्दर्शन को बताने के लिए मुख्य चिह्न है, इसलिये जिन-भक्ति निरंतर करना और जिन-आज्ञा मानकर आगमोक्त मार्ग में प्रवर्तना यह श्रीगुरु का उपदेश है । अन्य जिन-आज्ञा सिवाय सब कुमार्ग हैं, उनका प्रसंग छोड़ना; इसप्रकार करनेसे आत्म-कल्याण होता है ।

(छप्पय)
जीव सदा चिदभाव एक अविनाशी धारै
कर्म निमितकूं पाप अशुद्धभावनि विस्तारै ॥
कर्म शुभाशुभ बांधि उदै भरमै संसारै
पावै दुःख अनंत च्यारि गतिमैं डुलि सारै ॥
सर्वज्ञदेशना पापके तजै भाव मिथ्यात्व जब
निजशुद्धभाव धरि कर्महरि लहै मोक्ष भरमै न तब ॥
(दोहा)
मंगलमय परमातमा, शुद्धभाव अविकार
नमूँ पाय पाऊँ स्वपद, जाचूँ यहै करार ॥
इति श्री कुन्दकुन्द-स्वामि-विरचित भाव-प्राभृत की जयपुर निवासी पं० जयचन्द्रजी छावड़ा कृत देश-भाषामय वचनिका समाप्त ॥५॥