
णाणमयं अप्पाणं उवलद्धं जेण झडियकम्मेण
चइऊण य परदव्वं णमो णमो तस्स देवस्स ॥1॥
परद्रव्य को परित्याग पाया ज्ञानमय निज आतमा ।
शत बार उनको हो नमन निष्कर्म जो परमातमा ॥१॥
अन्वयार्थ : [जेण] जिनने [परदव्वं] परद्रव्य को [चइऊण] छोड़कर, [झडियकम्मेण] द्रव्यकर्म, भावकर्म [य] और नोकर्म खिर गये हैं ऐसे होकर, निर्मल [णाणमयं] ज्ञानमयी [अप्पाणं] आत्मा को [उवलद्धं] प्राप्त कर लिया है [तस्स] इस प्रकार के [देवस्स] देव को हमारा [णमो णमो] नमस्कार हो-नमस्कार हो ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
यह 'मोक्षपाहुड' का प्रारंभ है । यहाँ जिनने समस्त पर-द्रव्य को छोड़कर कर्म का अभाव करके केवल-ज्ञानानंद-स्वरूप मोक्ष-पद को प्राप्त कर लिया है, उन देव को मंगल के लिये नमस्कार किया यह युक्त है । जहाँ जैसा प्रकरण वहाँ वैसी योग्यता । यहाँ भावमोक्ष तो अरहंत के है और द्रव्य--भाव दोनों प्रकार के मोक्ष सिद्ध परमेष्ठी के हैं, इसलिये दोनों को नमस्कार जानो ॥१॥
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