+ पर-द्रव्य से दुर्गति और स्व-द्रव्य से ही सुगति होती है -
परदव्वादो दुग्गई सद्दव्वादो हु सुग्गई होइ
इय णाऊण सदव्वे कुणह रई विरह इयरम्मि ॥16॥
परद्रव्य से हो दुर्गति निजद्रव्य से होती सुगति ।
यह जानकर रति करो निज में अर करो पर से विरति ॥१६॥
अन्वयार्थ : [परदव्वादो] पर-द्रव्य से [दुग्गई] दुर्गति [हु] ही [होइ] होती है और [सद्दव्वादो] स्व-द्रव्य से [सुग्गई] सुगति ही होती है [इय] ऐसा [णाऊण] जानकर [सदव्वे] स्व-द्रव्य में [रई] रति / लीनता [कुणह] करो और [इयरम्मि] अन्य जो पर-द्रव्य उनसे [विरह] विरति करो ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

लोक में भी यह रीति है कि अपने द्रव्य से रति करके अपना ही भोगता है वह तो सुख पाता है, उस पर कुछ आपत्ति नहीं आती है और पर-द्रव्य से प्रीति करके चाहे जैसे लेकर भोगता है उसको दुःख होता है, आपत्ति उठानी पड़ती है । इसलिये आचार्य ने संक्षेप में उपदेश दिया है कि अपने आत्म-स्वभाव में रति करो इससे सुगति है, स्वर्गादिक भी इसी से होते है और मोक्ष भी इसी से होता है और पर-द्रव्य से प्रीति मत करो इससे दुर्गति होती है, संसार में भ्रमण होता है ।

यहाँ कोई कहता है कि स्व-द्रव्य में लीन होने से मोक्ष होता है और सुगति--दुर्गति तो पर-द्रव्य की प्रीति से होती है ? उसको कहते हैं कि-यह सत्य है परन्तु यहाँ इस आशय से कहा है कि पर-द्रव्य से विरक्त होकर स्व-द्रव्य में लीन होवे तब विशुद्धता बहुत होती है, उस विशुद्धता के निमित्त से शुभ-कर्म भी बँधते हैं और जब अत्यंत विशुद्धता होती है तब कर्मों की निर्जरा होकर मोक्ष होता है, इसलिये सुगति--दुर्गति का होना कहा वह युक्त है, इसप्रकार जानना चाहिये ॥१६॥