
आदसहावादण्णं सच्चित्ताचित्तमिस्सियं हवदि
तं परदव्वं भणियं अवितत्थं सव्वदरिसीहिं ॥17॥
आत्मस्वभावादन्यत् सच्चित्ताचित्तमिश्रितं भवति
तत् परद्रव्यं भणितं अवितत्थं सर्वदर्शिभिः ॥१७॥
जो आतमा से भिन्न चित्ताचित्त एवं मिश्र हैं ।
उन सर्व-द्रव्यों को अरे ! पर-द्रव्य जिनवर ने कहा ॥१७॥
अन्वयार्थ : [आदसहावादण्णं] आत्म-स्वभाव से अन्य [सच्चित्ताचित्तमिस्सियं] सचित्त , अचित्त और मिश्र [हवदि] होते हैं, [तं] ये सब [परदव्वं] परद्रव्य [भणियं] जानो, ऐसा [सव्वदरिसीहिं] सर्वदर्शी सर्वज्ञ भगवान ने [अवितत्थं] सत्यार्थ कहा है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
अपने ज्ञान-स्वरूप आत्मा सिवाय अन्य चेतन, अचेतन, मिश्र वस्तु हैं वे सब ही पर-द्रव्य हैं, इसप्रकार अज्ञानी को समझाने के लिये सर्वज्ञ-देव ने कहा है ॥१७॥
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