
जो इच्छइ णिस्सरिदुं संसारमहण्णवाउ रुद्दाओ
कम्मिंधणाण डहणं सो झायइ अप्पयं सुद्धं ॥26॥
यः इच्छति निःसर्त्तुं संसारमहार्णवात् रुद्रात्
कर्मेन्धनानां दहनं सः ध्यायति आत्मानं शुद्धम् ॥२६॥
जो भव्यजन संसार-सागर पार होना चाहते ।
वे कर्म ईंधन-दहन निज शुद्धात्मा को ध्यावते ॥२६॥
अन्वयार्थ : [जो] यदि [रुद्दाओ] भीषण [संसारमहण्णवाउ] संसाररूपी समुद्र से [णिस्सरिदुं] निकलना [इच्छइ] चाहता है [सो] तो [कम्मिंधणाण] कर्मरूपी ईंधन को [डहणं] दहन करनेवाले [अप्पयं सुद्धं] शुद्ध आत्मा का [झायइ] ध्यान कर ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
निर्वाण की प्राप्ति कर्म का नाश हो तब होती है और कर्म का नाश शुद्धात्मा के ध्यान से होता है अतः जो संसार से निकलकर मोक्ष को चाहे वह शुद्ध-आत्मा जो कि-कर्ममल से रहित अनन्त--चतुष्टय सहित (निज निश्चय) परमात्मा है, उसका ध्यान करता है । मोक्ष का उपाय इसके बिना अन्य नहीं है ॥२६॥
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