
जचंदछाबडा :
मुनि आत्मा का ध्यान ऐसा होकर करे -- प्रथम तो क्रोध, मान, माया, लोभ इन सब कषायों को छोड़े, गारव को छोड़े, मद जाति आदि के भेद से आठ प्रकार का है उसको छोड़े, रागद्वेष छोड़े और लोक-व्यवहार जो संघ में रहने में परस्पर विनयाचार, वैयावृत्य, धर्मोपदेश, पढ़ना, पढ़ाना है उसको भी छोड़े, ध्यान में स्थित हो जावे, इसप्रकार आत्मा का ध्यान करे । यहाँ कोई पूछे कि सब कषायों का छोड़ना कहा है उसमें तो सब गारव मदादिक आ गये फिर इनको भिन्न भिन्न क्यों कहे ? उसका समाधान इसप्रकार है कि ये सब कषायों में तो गर्भित हैं किन्तु विशेषरूप से बतलाने के लिए भिन्न भिन्न कहे हैं । कषाय की प्रवृत्ति इसप्रकार है -- जो अपने लिये अनिष्ट हो उससे क्रोध करे, अन्य को नीचा मानकर मान करे, किसी कार्य निमित्त कपट करे, आहारादिक में लोभ करे । यह गारव है वह रस, ऋद्धि और सात, ऐसे तीन प्रकार का है ये यद्यपि मान-कषाय में गर्भित हैं तो भी प्रमाद की बहुलता इनमें है, इसलिये भिन्न-रूप से कहे हैं । मद -- जाति, लाभ, कुल, रूप, तप, बल, विद्या, ऐश्वर्य इनका होता है, वह न करे । राग-द्वेष प्रीति-अप्रीति को कहते हैं, किसी से प्रीति करना, किसी से अप्रीति करना, इसप्रकार लक्षण के भेद से भेद करके कहा । मोह नाम पर से ममत्व-भाव का है, संसार का ममत्व तो मुनि के है ही नहीं, परन्तु धर्मानुराग से शिष्य आदि में ममत्व का व्यवहार है, वह भी छोड़े । इसप्रकार भेद-विवक्षा से भिन्न भिन्न कहे हैं, ये ध्यान के घातक भाव हैं, इनको छोड़े बिना ध्यान होता नहीं है इसलिये जैसे ध्यान हो वैसे करे ॥२७॥ |