
जं मया दिस्सदे रूवं तं ण जाणादि सव्वहा
जाणगं दिस्सदे णेव तम्हा जंपेमि केण हं ॥29॥
यत् मया दृश्यते रूपं तत् न जानाति सर्वथा
ज्ञायकं दृश्यते न तत् तस्मात् जल्पामि केन अहम् ॥२९॥
दिखाई दे जो मुझे वह रूप कुछ जाने नहीं ।
मैं करूँ किससे बात मैं तो एक ज्ञायकभाव हूँ ॥२९॥
अन्वयार्थ : [जं] जिस [रूवं] रूप को [मया] मैं [दिस्सदे] देखता हूँ [तं] वह [सव्वहा] सब प्रकार से कुछ भी [ण] नहीं [जाणादि] जानता है और [जाणगं] ज्ञायक [दिस्सदे णेव] दीखता नहीं [तम्हा] इसलिये [हं] मैं [केण] किससे [जंपेमि] बोलूँ ?
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
यदि दूसरा कोई परस्पर बात करनेवाला हो तब परस्पर बोलना संभव है, किन्तु आत्मा तो अमूर्तिक है उसको वचन बोलना नहीं है और जो रूपी पुद्गल है वह अचेतन है, किसी को जानता नहीं देखता नहीं । इसलिये ध्यान करनेवाला कहता है कि-मैं किससे बोलूँ ? इसलिये मेरे मौन है ॥२९॥
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