
जचंदछाबडा :
कई अन्यमती योगी ध्यानी कहलाते हैं, इसलिये जैन-लिंगी भी किसी द्रव्य-लिंगी के धारण करने से ध्यानी माना जाय तो उसके निषेध के निमित्त इसप्रकार कहा है कि -- मिथ्यात्व और अज्ञान को छोड़कर आत्मा के स्वरूप को यथार्थ जानकर सम्यक्-श्रद्धान तो जिसने नहीं किया उसके मिथ्यात्व-अज्ञान तो लगा रहा तब ध्यान किसका हो तथा पुण्य-पाप दोनों बंध-स्वरूप हैं इनमें प्रीति-अप्रीति रहती है, जब तक मोक्ष का स्वरूप भी जाना नहीं है तब ध्यान किसका हो और (--सम्यक् प्रकार स्वरूपगुप्त स्वअस्तिमें ठहरकर) मन वचन की प्रवृत्ति छोड़कर मौन न करे तो एकाग्रता कैसे हो ? इसलिये मिथ्यात्व, अज्ञान, पुण्य, पाप, मन, वचन, काय की प्रवृत्ति छोड़ना ही ध्यान में युक्त कहा है; इसप्रकार आत्मा का ध्यान करने से मोक्ष होता है ॥२८॥ |