
जो सुत्तो ववहारे सो जोई जग्गए सकज्जम्मि
जो जग्गदि ववहारे सो सुत्तो अप्पणो कज्जे ॥31॥
इस जाणिऊण जोई ववहारं चयइ सव्वहा सव्वं
झायइ परमप्पाणं जह भणियं जिणवरिंदेहिं ॥32॥
यः सुप्तः व्यवहारे सः योगी जागर्ति स्वकार्ये
यः जागर्ति व्यवहारे सः सुप्तः आत्मनः कार्ये ॥३१॥
इति ज्ञात्वा योगी व्यवहारं त्यजति सर्वथा सर्वम्
ध्यायति परमात्मानं यथा भणितं जिनवरेन्द्रैः ॥३२॥
जो सो रहा व्यवहार में वह जागता निज कार्य में ।
जो जागता व्यवहार में वह सो रहा निज कार्य में ॥३१॥
इमि जान जोगी छोड़ सब व्यवहार सर्वप्रकार से ।
जिनवर कथित परमातमा का ध्यान धरते सदा ही ॥३२॥
अन्वयार्थ : जो [ववहारे] व्यवहार में [सुत्तो] सोता है [सो जोई] वह योगी [सकज्जम्मि] स्व के कार्य में [जग्गए] जागता है और जो [ववहारे] व्यवहार में [जग्गदि] जागता है [सो] वह अपने [अप्पणो कज्जे] आत्म-कार्य में [सुत्तो] सोता है ।
[इस] ऐसा [जाणिऊण] जानकर [जोई] योगी [सव्वं] समस्त [ववहारं] व्यवहार को [सव्वहा] सब प्रकार से [चयइ] छोड़कर [जह] जैसे [जिणवरिंदेहिं] जिनवरेन्द्र ने [भणियं] कहा, वैसे [परमप्पाणं] परमात्मा का [झायइ] ध्यान करता है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
मुनि के संसारी व्यवहार तो कुछ है नहीं और यदि है तो मुनि कैसा ? वह तो पाखंडी है । धर्म का व्यवहार संघ में रहना, महाव्रतादिक पालना-ऐसे व्यवहारमें भी तत्पर नहीं है; सब प्रवृत्तियों की निवृत्ति करके ध्यान करता है वह व्यवहार में सोता हुआ कहलाता है और अपने आत्म-स्वरूप में लीन होकर देखता है, जानता है वह अपना आत्म-कार्य में जागता है । परन्तु जो इस व्यवहार में तत्पर है-सावधान है, स्वरूप की दृष्टि नहीं है वह व्यवहार में जागता हुआ कहलाता है ॥३१॥
सर्वथा सर्व व्यवहार को छोड़ना कहा, उसका आशय इस प्रकार है कि लोक-व्यवहार तथा धर्म-व्यवहार सब ही छोड़ने पर ध्यान होता है इसलिये जैसे जिनदेव ने कहा है वैसे ही परमात्मा का ध्यान करना । अन्यमती परमात्मा का स्वरूप अनेक प्रकार से अन्यथा कहते हैं, उसके ध्यान का भी वे अन्यथा उपदेश करते हैं, उसका निषेध किया है । जिनदेव ने परमात्मा का तथा ध्यान का स्वरूप कहा वह सत्यार्थ है, प्रमाणभूत है वैसे ही जो योगीश्वर करते हैं वे ही निर्वाण को प्राप्त करते हैं ॥३२॥
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