
जचंदछाबडा :
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, परिग्रहत्याग ये पाँच महाव्रत, ईर्या, भाषा, एषणा, आदाननिक्षेपण प्रतिष्ठापना ये पाँच समिति और मन, वचन कायके निग्रहरूप तीन गुप्ति-यह तेरह प्रकार का चारित्र जिनदेवने कहा है उसमें युक्त हो और निश्चय--व्यवहाररूप, सम्यग्दर्शन--ज्ञान--चारित्र कहा है इनसे युक्त होकर ध्यान और अध्ययन करने का उपदेश है । इनमें भी प्रधान तो ध्यान ही है और यदि इसमें मन न रुके तो शास्त्रके अभ्यासमे मनको लगावे यह भी ध्यानतुल्य ही है, क्योंकि शास्त्रमें परमात्माके स्वरूप का निर्णय है सो यह ध्यानका ही अंग है ॥३३॥ |