+ जो रत्नत्रय की आराधना करता है वह जीव आराधक ही है -
रयणत्तयमाराहं जीवो आराहओ मुणेयव्वो
आराहणाविहाणं तस्स फलं केवलं णाणं ॥34॥
रत्नत्रयमाराधयन् जीवः आराधकः ज्ञातव्यः
आराधनाविधानं तस्य फलं केवलं ज्ञानम् ॥३४॥
आराधना करते हुये को अराधक कहते सभी ।
आराधना का फल सुनो बस एक केवलज्ञान है ॥३४॥
अन्वयार्थ : [रयणत्तयमाराहं] रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र) की आराधना करते हुए [जीवो] जीव को [आराहओ] आराधक [मुणेयव्वो] जानो, [तस्स] जिस [आराहणाविहाणं] आराधना के विधान (निर्माण) का [फलं] फल [केवलं णाणं] केवलज्ञान है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

जो सम्यग्दर्शन--ज्ञान--चारित्रकी आराधना करता है वह केवलज्ञानको प्राप्त करता है वह जिनमार्ग में प्रसिद्ध है ॥३४॥